Inner Empowerment of Media Professionals – मीडिया कर्मियों का आंतरिक सशक्तिकरण

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At Present, media professionals are only looking at the outer world, and its outer events, situations and people involved in them with their outer, physical eyes and are reporting them with their partial worldviews.  They are yet to find out the inner third eye and realise its inner power.

If they could explore this inner power, present within; then transformation of this present world would have been much easier with their own self-realisation and self-transformation, thereby justifying the status of media as the fourth pillar of democracy in true sense of the term. Empowerment of media persons will not be possible until they realise their spiritual being – the inner soul – and thereby empower them spiritually.

Once we realise our inner being, we can experience and enjoy the angelic stage like flying in the sky with the wings of knowledge and yoga irrespective of public interference and presence of the huge crowd around.  The realization of our spiritual point of light form of soul, which is invisible to others, can be used to guide the people and transmit energy to the environment through our spiritual perception, attitude, vision and transmission of spiritual vibrations.

To visualise the soul as point of light form is the key to empower the soul, which can absorb power from God – the Almighty who bestows us the divine insight by opening our third eye of knowledge. Thus, the soul can energize itself with His divine power through the practice of Rajyoga Meditation taught by Him through the Brahma Kumaris Organization.

मीडिया कर्मियों का आंतरिक सशक्तिकरण

आर्कमिडीज ने जब उत्प्लावकता (Buoyancy)  के सिद्धांत को समझ लिया तब बरबस ही वह चीख उठा – यूरेका, यूरेका (पा लिया – पा लिया)। तब से लेकर आज तक इससे विज्ञान एवं वैज्ञानिकों का इस सभ्य समाज का भी बहुत भला हुआ है। काश कि हमारे मीडियाकर्मी के साथ ही जिन्होंने अभी तक भी अपनी आंतरिक उत्प्लावकता के सिद्धांतों को नहीं समझा है, वे इसे समझ लेते तो वे भी बरबस ही पुकार उठते – यूरेका, यूरेका। तब हमारे इस संसार को एक बेहतर संसार में बदलने में कितनी सहूलियत हो जाती और संसार को लोकतंत्र के इस सर्वाधिक संजीदा चौथे स्तंभ की पूर्ण मदद मिल जाती। मदद मिल जाती उन तमाम भूखे नंगों को, बेसहारा, मजलूम लोगों को जो न जाने कब से एक अदद रोटी का स्वप्न देखते आ रहे हैं।

हम यह नहीं कहते कि आज मीडियाकर्मी अशक्त हैं। वे पूरी तरह सशक्त हैं। पूरी ही दुनियाँ में उनका कोई सानी भी नहीं है। तथापि यह सशक्तिकरण तब तक अधूरा ही रहेगा जब तक कि वे अपने वास्तविक आंतरिक आध्यात्मिक स्वरूप के रूबरू नहीं हो जाते। आप कल्पना कीजिए कि आप एक शांत सड़क पर चले जा रहे हैं। अनेक लोग भी वहाँ से गुजर रहे हैं मगर उनमे से कोई भी आपको नहीं देख पा रहा है। कोई भी आपकी शांति में खलल नहीं डाल पा रहा। कोई भी आपके मामले में कोई हस्तक्षेप नहीं कर पा रहा। आप अपने आप में खोये, संसार की सर्वोच्च सत्ता के साथ मीठी वर्तालाप करते हुए अपनी ही धुन में विचर रहे हैं। आप आनंद के अनूठे, असीम पलों में जी रहे हैं। आनंद की उर्जा आपको सराबोर किए दे रही है। आपको अपना वजूद बादलों से भी हल्का महसूस हो रहा है और आप असीम, अनंत आकाश में उड़ते जा रहे हैं। जहाँ-जहाँ आप विचरण करना चाहें, आप वहीं जा सकते हैं। पूरी ही दुनियाँ के लोग चाह कर भी आपको रोक नहीं सकते क्योंकि आप अदृश्य हैं।

आप अपने लोगों की खोज खबर ले सकते हैं एवं उनको समाधान भी दे सकते हैं। इतना ही नहीं, विश्व की सकारात्मकता में भी आप मनमाना इजाफा कर सकते हैं क्योंकि आप एक बंधन रहित, बिन्दुरूप, प्रकाशमय, शांत, चैतन्य, अनादि, अविनाशी, शाश्वत उर्जा हैं, जो असीम सकारात्मक उर्जा संप्रेषित कर सकते हैं। इस नश्वर देह के भीतर से, इस देह को संचालित करने की जिम्मेवारी आप उर्जा बिंदु की ही है। स्वयं को उसी बिंदु के रूबरू देखना ही आंतरिक सशक्तिकरण है। आपने आज से पहले इतनी असीम शक्ति अपने अंदर कभी महसूस नहीं की है। अपने इसी उर्जामय स्वरूप की अनूभूति से हमें अमरत्व का ईश्वरीय वरदान प्राप्त होता है। हम असीम शक्तियों एवं खुशियों से भर जाते हैं। हमें दिव्य चक्षु का वरदान मिल जाता है। उस दिव्य चक्षु से हम इस संसार को इसके वास्तविक स्वरूप में देख पाते हैं और हम यह भी जान लेते हैं कि अब हमारे लिए कौन सा कार्य आवश्यक है। हम स्वयं को व्यर्थ से आसानी से बचा लेते हैं। सर्व के कल्याण के लिए  स्वतः स्फूर्त संजीवनी शक्ति का संचार हमारे अंदर होने लगता है। अब हम परमात्मा के शांति दूत बन चुके होते हैं। पतवार हमारे हाथ में आ जाती है। यही है हमारा, आपका, सर्व का एवं समस्त मीडियाकर्मियों का आंतरिक सशक्तिकरण। बिना इसके जनकल्याण एक दिवास्वप्न ही है। जब तक यह विश्व हमें अपना ही परिवार, अपने ही बंधु रूप में प्रत्यक्ष नजर नहीं आएंगे, हम उनके लिए खास कुछ भी नहीं कर पाएंगे। बात है वृत्ति में परिवर्तन की। वह परिवर्तन तभी आएगा जब हम अपने एवं दूसरों के इसी वास्तविक निज प्रकाशमय स्वरूप को देख लेंगे – जान लेंगे। आंतरिक सशक्तिकरण का एकमात्र कारगर औजार यही है। आइए हम अपने इस निज प्रकाशमय स्वरूप का गहन चिंतन करें एवं इसमें ही गहरे समा जाएं।

Prof. Kamal Dixit, Editor